दूरसंचार के माध्यम ने कैसे बदली हमारी जिंदगी ?

दूरसंचार ने मानवीय जीवन के कायाकल्प में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन, इसकी महत्ता और उपयोगिता कोरोनाकाल में और ज्यादा बढ़ी है। बेलगाम होते कोरोना संक्रमण को रोकने में लॉकडाउन और अन्य बंदिशों का सहारा लेना पड़ा है।

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इंटरनेट ने दूरियों को खत्म कर दिया है और स्मार्टफोन की बदौलत सारा संसार जैसे हमारी हथेली में सिमट गया है। स्मार्टफोन को यह ताकत दूरसंचार तकनीक से मिली है, जिसने दुनिया को एक सूत्र में पिरोने का काम किया है। जीवन का अभिन्न अंग बन चुके दूरसंचार माध्यमों की अहमियत कोरोना वायरस के संक्रमण से उपजी कोविड-19 महामारी में अधिक प्रभावी रूप में उभरकर आयी है।

छात्र विज्ञान एव प्रौद्योगिकी और तकनीक का प्रयोग करते हुए

संक्रमण से बचने के लिए लोग जिस ‘वर्क फ्रॉम होम’ यानी घर से काम करने की सुविधा का लाभ उठा पाने में सक्षम हुए हैं, वह दूरसंचार की कोख से जन्मी सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति से ही संभव हो सकी है। दूरसंचार के इस योगदान को याद करने और उसके प्रति जागरूरकता का प्रसार करने के मकसद से प्रत्येक वर्ष 17 मई को अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों से मिले इस आयोजन के प्रोत्साहन पर हमेशा समय और परिस्थितियों की छाप देखने को मिली है। यही कारण है कि इस साल अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार दिवस की थीम ‘ट्रांसफॉर्मिंग इन चैलेंजिंग टाइम्स’ यानी चुनौतीपूर्ण दौर में कायाकल्प रखी गई है, जो कोविड-19 के चुनौतीपूर्ण समय को देखते हुए प्रासंगिक ही कही जाएगी।

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वर्ष 1865 में अंतरराष्ट्रीय टेलीग्राफ कन्वेंशन अस्तित्व में आया था। उसकी याद में पहली बार वर्ष 1969 में अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार दिवस का आयोजन हुआ। उसके उपरांत 2005 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 17 मई का दिन विश्व दूरसंचार एवं सूचना सोसायटी दिवस (ड्ब्ल्यूएसआईएसडी) के रूप में अधिकृत किया। इससे जुड़ी एक दिचलस्प बात यह भी है कि जिस दिन संयुक्त राष्ट्र ने यह घोषणा की, उस दिन की तारीख भी 17 मई ही थी। उसके बाद से यह एक परंपरा बन गई। इस पर आधिकारिक मुहर नवंबर 2006 में तुर्की के शहर अंताल्या में लगी। इस आयोजन का उद्देश्य पूरी दुनिया में संचार और इंटरनेट को लेकर जागरूकता का प्रसार करना है।

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इन दिनों देश में 5जी परीक्षण को लेकर मिथ्या प्रचार चल रहा है, ऐसे दुष्प्रचारों की काट करना भी इस आयोजन का एक उद्देश्य है। इसके साथ ही, बड़े शहरों और आर्थिक केंद्रों में अपेक्षाकृत बेहतर दूरसंचार एवं इंटरनेट सेवाओं के सापेक्ष दूरदराज के इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर सेवाओं के रूप में जो ‘डिजिटल डिवाइड’ की खाई है, उसे पाटना भी इसका एक उद्देश्य है। इस दिन का एक लक्ष्य इन सुदूरवर्ती और ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों के लिए सूचना और संचार को सुलभ बनाने के समाधान तलाशने पर मंथन करना भी है। इसके साथ ही, यह इंटरनेट और नई प्रौद्योगिकियों द्वारा प्रवर्तित उन परिवर्तनों से परिचय कराता है, जो जीवन को सुगम बनाने में सार्थक भूमिका निभा रहे हैं।

दूरसंचार का सबसे उपयोगी यंत्र राडार

दूरसंचार ने मानवीय जीवन के कायाकल्प में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन, इसकी महत्ता और उपयोगिता कोरोनाकाल में और ज्यादा बढ़ी है। बेलगाम होते कोरोना संक्रमण को रोकने में लॉकडाउन और अन्य बंदिशों का सहारा लेना पड़ा है। इसके कारण लोगों की आवाजाही कम हुई है। लोगों को घर से बाहर न निकलना पड़े, और उनके दफ्तर का कामकाज भी प्रभावित न हो, इसमें दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ की संकल्पना को साकार किया है। इससे न केवल कामकाज का सुचारू संचालन संभव हुआ है, बल्कि इसने कई ऐसे लाभ भी दिए हैं, जिनके बारे में पहले कभी सोचा नहीं गया। दूरसंचार-सूचना प्रौद्योगिकी की शक्ति ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ को एक नया चलन बना दिया है। ऐसे में, कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि कोरोनाकाल के बाद भी संस्थानों द्वारा इस विकल्प को आजमाना जारी रखा जाए।

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‘वर्क फ्रॉम होम’ के चलन से न केवल संस्थानों की परिचालन लागत घटी है, बल्कि इससे कर्मियों के समय और ऊर्जा की भी बचत हो रही है, जिसे वे अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगा सकते हैं। इसके साथ ही, घटती आवाजाही से परिवहन पर कम हुए बोझ से घटते प्रदूषण से पर्यावरण को भी राहत मिली है। दफ्तरों में एयर-कंडीशनर आदि का उपयोग घटने से ऊर्जा की खपत, और हरित ग्रह प्रभाव को मोर्चे पर भी समीकरण संतुलित हुए हैं। ऐसे में, इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार दिवस की जो थीम है, उसमें इस कोरोनाकाल को देखते हुए कुछ नए समाधानों पर मंथन संभव है, ताकि ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसी संकल्पनाओं को समृद्ध करके इसकी राह में आने वाली चुनौतियों को कम किया जाए।

संचार एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। यही कारण है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘भारत को राज्यों का संघ’ मानने के बावजूद संचार को विशुद्ध रूप से संघ सूची का ही विषय माना है। इस पर नीतियां बनाने का विशिष्ट अधिकार केंद्र का ही है। संचार से जुड़ी संवेदनशीलता को देखते हुए ही ऐसा किया गया है। हमारे राष्ट्र-निर्माताओं की यह दूरदर्शिता इस दौर में बहुत तार्किक सिद्ध हुई है। संचार के क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करने के लिए दुनिया के कुछ देशों की संदिग्ध मंशा के कारण ऐसा स्पष्ट दिख रहा है। उदाहरण के तौर पर चीन की कंपनी हुआवे और जेडटीई जैसी कंपनियों के लिए दुनिया के तमाम देश अपने दरवाजे बंद कर रहे हैं।

लैपटॉप के माध्यम से छात्रों को तकनीक को समझाते हुए शिक्षक

देश में फिलहाल 4जी दूरसंचार सेवाएं संचालित हो रही हैं, और 5जी परीक्षण की तैयारी चल रही है। 5जी परीक्षण को लेकर कुछ दुष्प्रचार भी हो रहे हैं, जिनकी समय से काट करने की आवश्यकता है, ताकि जब ये सेवाएं शुरू हों, तो लोगों को उन्हें अपनाने में कोई हिचक न हो।

सरकार को दूरदराज के इलाकों में संचार सेवाओं के दायरे को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाने चाहिए ताकि डिजिटल डिवाइड की समस्या दूर हो। इसके साथ ही, पिछले कुछ दिनों में सरकार द्वारा कुछ निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा की जा रही शरारत की स्थिति में उस पूरे इलाके की संचार सेवाएं ठप कर दी जाती हैं। इससे ऑनलाइन भुगतान से लेकर अन्य सेवाएं भी प्रभावित होती हैं, जिससे लोगों को समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। इसका भी कोई समाधान निकालने का प्रयास किया जाए कि कुछ सीमित सेवाओं पर प्रतिबंध लगाकर शेष अन्य गतिविधियों को सामान्य रूप से चलने दिया जाए। इसका समाधान तलाशने की दिशा में विचार करने और आगे बढ़ाने के लिए भला अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार दिवस से अच्छा दिन और क्या हो सकता है।

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